छापकटैया - printing press

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Product Details

Publisher - Siddharth Books
Author - Prof. Rajendra Badgujar
Language - Hindi
Binding - Paperback
Total Pages - 308

Description

हरियाणवी लोकसाहित्य में रागणी एवं सांग का विशेष महत्त्व है। किशनलाल भाट, पं. शंकरदास, बाजे भगत, पं. लखमीचंद, मुंशीराम जांडली, पं. मांगेराम, राय धनपतसिंह निंदाना, चंद्रलाल बादी, महाशय दयाचंद मायना और मा. नेकीराम, रामकिशन व्यास, मा. दयाचंद आजाद सिंघाना, पं. रामकुमार खालेटिया आदि अनेक लोककवियों और सांगियों ने हरियाणा के लोकसाहित्य को अपने सृजन से समृद्ध किया है। सांग (स अंग) का अर्थ अंग सहित। अर्थात् आंगिक भाव-भंगिमाओं सहित किसी कथा को प्रदर्शित करना। दूसरे शब्दों में-अभिनय द्वारा गीत/संगीत/नृत्य/रागणियों के माध्यम से किसी कथा का मंचन करना 'सांग' कहलाता है।

एक समय में सांग हरियाणा, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, दिल्ली आदि अनेक राज्यों में बहुत ही लोकप्रिय मनोरंजक और जीवंत विधा थी। अधुनातन सोशल मीडिया और तकनीकी विस्फोट से पहले सांग ही ग्रामीण लोक के मनोरंजन का साधन होता था। सांग ही लोगों का संस्कार निर्मित करता था। सांगियों के प्रति लोक में एक विशेष आदर होता था। वही लोक के कबीर, तुलसी और सूर या रैदास होते थे।

सांग में गीत 'रागणी' के रूप में आते हैं। रागणी टेक, कली, तौड़ और छाप से बनती है। आमतौर पर रागणी चार कली की होती है और चौकलिया एवं छकलिया होती है। दो, तीन, चार, छह अंतरों की रागणी होती है। चौथी या अंतिम कली में कवि अपना नाम 'छाप' के रूप में जोड़ता है। छाप को हम स्वामित्व भी कह सकते हैं। लोककवि छाप में रागणी के सर्जक होने का दावा पेश करता है। चौथी कली के किसी भी अंतरे में वह अपना नाम डालता है। यह अच्छी बात है। यह मूल कवि का उसकी सृजित रागणी पर उसका कॉपीराईट है। रागणी को कुछ छापकटैयों से बचाने के लिए कवि शंकरदास से जो शुरूआत हुई कि उन्होंने चौथी कली में अपना नाम जोड़ना शुरू कर दिया। 

शायद उन्हें इस बात का अहसास रहा होगा कि छापकटैये मुंह बाय लपर-लपर जीभ निकाले छाप काटने का इंतजार कर रहे हैं। पं. शंकरदास से पहले रागणी की चौथी कली में कवि का नाम इतना सुव्यवस्थित रूप में नहीं मिलता है। छाप रागणी के रचयिता को जानने का सबसे सशक्त तरीका है।

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